जीवन परिचय

स्वर्गीय श्री महेश प्रताप सिंह राठौर जी, पूर्व महासचिव व संस्थापक अखिल भारतीय नेत्रहीन संघ] का जन्म सन 15/08/1943 उत्तर प्रदेश के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री महेंद्र सिंह ब्रिटिश सेना में थे और इनके जन्म के समय वे क्वेटा बलूचिस्तान में थे] 3 साल की उम्र में इन्हे चेचक निकली। पिता की व्यस्तता और माता की लाचारी की वजह से इनका इलाज न हो सका जिससे उनकी दोनों आँखों की ज्योति छीन गई और वे ज्योति विहीनता के शिकार हो गए।
दृष्टि वाधित होने के कारण उनका बचपन अन्य बालको की तुलना में अधिक कष्टप्रद था] जिससे उनकी शिक्षा प्रभावित हो रही थी] परन्तु शिक्षा के प्रति अत्यधिक लगाव होने के कारण पिता जी ने उनका दाखिला दिल्ली आकर पंचकुइयां रोड में एक अंध विद्यालय में दाखिला करवा दिया। जिसके फलस्वरूप अपनी छोटी सी आयु में ही अपने निकटतम सम्बन्धियों के प्रेम तथा स्नेह से वंचित रहना पड़ा] लेकिन उन्होंने वहां रहकर स्नातक शिक्षा प्राप्ति के अतिरिक स्कूल से कुर्सी] कालीन] निवार] चोक बनाना] बांस और चिक बनाना तथा संगीत की शिक्षा प्राप्त की और उनके ज्ञान व कुशलता को देखते हुए वहां के प्रबंधन ने उनको अध्यापक के पद पर नियुक्त किया उस समय जब देश के गृह मंत्री श्री गुलजारी लाल नंदा थे तब उन्होंने दृष्टि वधितो के लिए रेलवे तथा सड़क यात्रा में रियायतों की मांग उच्चाधिकारियों से की, पहले केवल रेलवे में पैसेंजर गाड़ियों में ही रियायत दी जाती थी परन्तु श्री राठौर जी के प्रयासों से रेल मंत्रालय दृष्टि वधितो को मेल तथा एक्सप्रेस ट्रेनों में भी रियायत देने को सहमत हुआ।
श्री राठौर जी ने दृष्टि वाधित स्कूल स्वयं ही इसलिए छोड़ा की वहां उनके ज्ञान और क्षमता के अनुरूप कार्य करने नहीं दिया गया] तथा वह वहां के प्रबंधन से असंतुष्ट थे] क्योकि संस्था में जनता द्वारा प्रदान आर्थिक सहयता का उचित उपयोग नहीं हो रहा था उस संस्था से त्याग पत्र के समय उनका वेतन मात्र 133 रु मासिक था।
त्याग पत्र देते समय उन्होंने निर्णय लिया था की अपने द्वारा स्थापित संस्था के माध्यम से दृष्टि वाधित व्यक्तियों की निस्वार्थ सेवा करेंगे और जिसकी (अखिल भारतीय नेत्रहीन संघ स्थापना वो अपने संगीत गुरु श्री जी एस सरदार के सहयोग से कर चुके थे और 1962 में इस को पंजीकृत कराया। जनता से प्राप्त सहयोग राशि को इकठ्ठा करके उन्होंने इसके अंतर्गत पहले एक प्रशिक्षण केंद्र चलाया जिसमे रहने खाने की तमाम सुविधाओं के साथ नेत्रहीन युवको को कुर्सी बुनने व चाक बनाने का प्रशिक्षण दिया जाने लगा। इस चाक की आपूर्ति सरकारी स्कूलों में की गई जिससे नेत्रहीन युवाओं को रोजगार मिला। तत्कालीन दिल्ली के उप राज्यपाल ने भी सभी सरकारी कार्यालयों में कुर्सी बनाने का कार्य केवल नेत्रहीन को देने के निर्देश जारी किये। इसी प्रकार लायंस क्लब की सहायता एवं सहयोग से उन्होंने मोमबत्ती बनाने का कार्य आरम्भ किया तथा जिसका प्रशिक्षण भी श्री राठौर जी ने स्वयं दिया। वर्तमान में इस संस्था के अन्तर्गत नर्सरी से बारहवीं कक्षा तक के छात्र- छात्राओं के लिए नियमित विद्यालय चलता है। और साथ ही विधार्थियो को कंप्यूटर शिक्षा] संगीत] मोमबत्ती बनाना व पेपर बैग बनानें का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
श्री राठौर जी शिक्षा के साथ साथ व्यावसायिक कुशलता को अतयंत महत्व देते थे। उनका मानना था की दृष्टिबाधित को आत्मनिर्भर बनाने के लिए यह आवयशक है।
उन्ही की दिनरात मेहनत] अथक् प्रयासों एवं जनसहयोग प्राप्त करने की क्षमता का परिणाम है की उनके द्वारा रोपित बीज आज विशाल वट वृक्ष की भांति नेत्रहीनो के शिक्षण, कौसल विकास में एक अनुपम उदहारण प्रस्तुत कर रहा है। उनका एक स्वप्न था की कोई भी नेत्रहीन व्यक्ति भिक्षावृति की ओर न जाये।
वे प्रकृति प्रेमी भी थे इसीलिए छात्रावास के चारो तरफ हरियाली देखी जा सकती है। उन्होंने विभिन्न प्रकार के पोधे खुले स्थानों में छात्रावास के अंदर और बाहर रोपे जिससे की पर्यावरण शुद्ध रह सके जिससे यहाँ रहने वाले और आने वाले व्यक्ति को शुद्धः वातावरण मिल सके !
श्री राठौर जी ने उत्तर भारत] मुंबई] राजस्थान] मध्य प्रदेश तथा जम्मू कश्मीर के कई विद्यालयों का दौरा किया और अपने मस्तिष्क में एक नक्शा बनाते हुए रोजनदरी पर मजदूरो को लगाकर पक्के भवन का विभिन्न चरणो में जनता के सहयोग से निर्माण करवाया जो की आज विद्यालय की मौजूदा बिल्डिंग है। यही नहीं उनकी सोच नेत्रहीन बच्चों के शिक्षण प्रशिक्षण व कौशल विकास तक ही सीमित नहीं रही अपितु उन्होंने वयस्क नेत्रहीनो के रोजगार के विषय में भी गंभीर चिंतन करते हुए उनके लिए एक प्रशिक्षण एवं पुनर्वास केंद्र की स्थापना के लिए एक परियोजना का संकल्प लिया। दिल्ली एक वह स्थान है जहाँ बड़े भूखंड संस्था की सीमित राशि में मिलना बहुत ही असंभव था अतः उन्होंने राष्टीय राजमार्ग जयपुर- कोटपुतली] राजस्थान के पास दो एकड़ भूमि खरीदी। यह सब बिना किसी सरकारी सहायता के पूर्णता जनता के सहयोग से किया गया।
यह सब देखते हुए उनके बड़े पुत्र श्री नागेन्द्र सिंह ने अपना पूर्ण जीवन संस्था को समर्पित करते हुए अपने पिता के पदचिन्हो पर चलते हुए नेत्रहीन बच्चो की सेवा में अपने आप को पूरी तरह लगा दिया और तन मन से उनकी सेवा में लग गए। उसके बाद उनके छोटे पुत्र श्री देवेन्द्र सिंह ने भी इंदिरा ग़ांधी अंतर राष्टीर्य हवाई अड्डे की अच्छी खासी नौकरी त्यागकर अपने पिता के साथ पूर्ण तल्लीनता से लगभग एक साल से जुड़ चुके थे परन्तु कुदरत को कुछ और ही मंजूर था और उसने इस अनथक प्रतापी मानव को 20-10-2013 को हमसे छीन लिया।
संस्था के लिए यह सुखद है की उनके परिजनों सहित दोनों सुपुत्रो ने गुरु जी के कार्यो को आगे बढ़ाया है और संस्था को निरंतर नई ऊंचाइयां प्रदान कर रहे है। संस्था के अध्यक्ष, समाजसेवी, पूर्व विधायक श्री ओ पी बब्बर संस्था की प्रगति से सर्वाधिक प्रसन्न वह व्यक्ति हैं जो उनके दोनों सुपुत्रो को निरन्तर प्रेरित करते हुए कहते है, की राठौर जी के दिखाए गए रास्ते पर चलते हुए संस्था को निरंतर आगे ले जाने के लिए अग्रसर रहो। उन्होंने सुझाव दिया की राठौर जी के जन्मदिवस पर तथा अवसान दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किये जाएँ जिससे भावी पीढ़ी प्रेरित होती रहे।
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